जानिये, जगत जननी आदि शक्ति माँता के साक्षात स्वरुप (माँ अम्बिका भवानी, आमी) – एक साक्षात शक्ति पीठ एवं मुर्धन्य सिद्धपीठ की कहानी एवं महिमा !

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Jagat Janni, Aadi Shakti Maa Ambika Bhawani

सर्व मंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके,
शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते !!

जगत जननी आदि शक्ति माँ अम्बिका भवानी (आमी), जिसे जगत जननी आदि शक्ति माँ का साक्षात स्वरुप तथा एक साक्षात शक्ति पीठ एवं मुर्धन्य सिद्धपीठ कहा जाता है, बिहार राज्य के छपरा (सारण) जिले के दिघवारा रेलवे स्टेशन के पास छपरा-पटना मुख्य मार्ग पर आमी गाँव में स्थित है !

तो आइये अब हम जानते हैं, उसी जगत जननी आदि शक्ति माँता के साक्षात स्वरुप (माँ अम्बिका भवानी, आमी) – एक साक्षात शक्ति पीठ एवं मुर्धन्य सिद्धपीठ की पूरी कहानी एवं महिमा !

प्राचीन पुराणों और इतिहास के अनुसार ये भगवान शिव की पत्नी उमा(सती) की जन्मस्थली और उनके पिता राजा दक्ष की कर्मस्थली थी, सती, जो ब्रह्मा जी के पुत्र प्रजापति दक्ष तथा प्रसूति कि सोलहवीं कन्या थी, जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। दक्ष द्वारा आद्या शक्ति माता को कन्या के रूप में प्राप्ति हेतु, कठिन साधना करने के फलस्वरूप, आदि शक्ति काली ने सती स्वरूप में दक्ष ये यहाँ जन्म धारण किया।

ब्रह्मा जी के कहने पर, दक्ष ने अपनी बेटी सती का विवाह शिव जी से किया, परन्तु वे इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे। एक बार किसी उत्सव पर दक्ष के पधारने पर, वहां पहले से ही बैठे भगवान शिव ने उन का सत्कार नहीं किया, परन्तु वह उपस्थित समस्त लोगो ने, उन का हाथ जोड़ वंदन किया। इस पर दक्ष क्रुद्ध हो गए, वे ससुर या पिता सामान थे। साथ ही, शिव जी का सम्बन्ध विध्वंसक वस्तुओं से होना भी एक कारण हैं। श्मशान में निवास करना, चिता भस्म शरीर में लगाना, खोपडीओ तथा हड्डीओं की माला धारण करना, सर्पो को अपना आभूषण बनाना, गांजा तथा चिल्लम पीना इत्यादि अमंगलकारी वस्तुओं से सम्बन्ध रखते थे। शिव जी दरिद्र थे, मारे हुऐ पशुओ के खाल पहनते थे, चिमटा, खप्पर, कमंडल, सांड, हड्डियां ही उनकी संपत्ति थी। उनके साथ डरावने भूत तथा प्रेत इत्यादि अशुभ शक्तियां रहती थी। साथ ही शिव जी के द्वारा ब्रह्मा जी का एक सर कट गया था, ब्रह्मा जी पांच मस्तकों से युक्त थे, अतः शिव जी को दक्ष ब्रह्म हत्या का दोषी मानते थे।

एक बार प्रजापति दक्ष (जो ब्रह्मा जी के पुत्र थे), ने ‘बृहस्पति श्रवा’ नाम के यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने तीनो लोको से समस्त प्राणिओ, ऋषियो, देवी-देवताओ इत्यादियों को निमंत्रित किया। दक्ष, भगवान शिव से घृणा करते थे परिणामस्वरूप भगवान शिव सहित उन से सम्बंधित किसी को भी, अपने यज्ञ आयोजन में आमंत्रित नहीं किया।

देवी सती ने जब देखा की तीनो लोको से समस्त प्राणी उन के पिता जी के यज्ञ आयोजन में जा रहे है, उन्होंने अपने पति भगवान शिव ने अपने पिता के घर, यज्ञ आयोजन में जाने कि अनुमति मांगी। भगवान शिव दक्ष के व्यवहार से परिचित थे, उन्होंने सती को अपने पिता के घर जाने की अनुमति नहीं दी तथा नाना प्रकार से उन्हें समझाने की चेष्टा की। परन्तु देवी सती नहीं मानी, अंततः भगवान शिव ने उन्हें अपने गणो के साथ जाने की अनुमति दे दी। सती अपने पिता दक्ष से उन के यज्ञानुष्ठान स्थल में घोर अपमानित हुई। दक्ष ने अपनी पुत्री सती को स्वामी सहित, खूब उलटा सीधा कहा। परिणामस्वरूप, देवी अपने तथा स्वामी के अपमान से तिरस्कृत हो, यज्ञ में आये सम्पूर्ण यजमानो के सामने देखते ही देखते अपनी आहुति यज्ञ कुण्ड में दे दी तथा देवी की मृत्यु हो गई।

भगवान शिव को जब इस घटना का ज्ञात हुआ, वो अत्यंत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने अपने जटा के एक टुकड़े से वीरभद्र को प्रकट किया, जो स्वयं महाकाल के ही स्वरूप थे, साथ ही महाकाली को भी। उन्होंने वीरभद्र तथा महाकाली को अपने गणों के साथ, दक्ष यज्ञ स्थल में सर्वनाश करने की आज्ञा दी। भगवान शिव के आदेशानुसार दोनों ने यज्ञ का सर्वनाश कर दिया, दक्ष का गाला काट उस के सर की आहुति यज्ञ कुण्ड में दे दी।

तदनंतर भगवान शिव यज्ञ स्थल में आये तथा अपनी प्रिय पत्नी सती के शव को कंधे पर उठा, तांडव नृत्य करने लगे। (शिव का नटराज स्वरूप, तांडव नित्य का ही प्रतिक हैं।) शिव के क्रुद्ध हो तांडव नृत्य करने के परिणामस्वरूप, तीनो लोको में हाहाकार मच गया तथा तीनो लोगो का विध्वंस होने लगा। तीनो लोको को भय मुक्त करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से, सती के मृत देह के टुकड़े कर दिए तथा वो भारत वर्ष के विभिन्न स्थानों में पतित हुऐ। जो देवी सती के पवित्र ५१ शक्ति पीठो के नाम से विख्यात हैं !

विभिन्न पौराणिक कथाओं के अनुसर “माँ अम्बिका” का यह मंदिर राजा प्रजापति दक्ष के यज्ञ स्थल पर अवस्थित माना जाता है ! तथा इस मंदिर से बराबर बराबर दुरी पर तिन ज्योतिर्लिंग पशुपतिनाथ – नेपाल, बाबा विश्वनाथ – वाराणसी और बाबा बैधनाथ – देवघर त्रिभुजकार आकृति में त्रिभुज के तिन बिन्दुओं पर अवस्थित हैं. जिन्हें भारत के नक़्शे में भी देखा जा सकता है !

मांर्कडेय पुराण में वर्णित राजा दक्ष की कर्मस्थली आमी में अवस्थित इस मंदिर का पौराणिक इतिहास रहा है।बताया जाता है कि यह स्थल प्रजापति राजा दक्ष का यज्ञ स्थल एवं राजा सुरथ तथा समाधी वैश्य की तपस्या स्थली रहीं है। मार्कण्डेय पुराण और दुर्गा शप्तशती के अनुसार कालांतर में राजा सुरथ तथा समाधी वैश्य ने इसी स्थान पर मिट्टी का भागाकार पिंड बना कर तीन वर्षों तक पूजा की थी तब देवी ने साक्षात प्रकट होकर उन्हें यहाँ दर्शन दिया था ! पुरे भारत वर्ष में मात्र यही एक मंदिर है जहाँ देवी की कोई मूर्ति विराजमान नहीं हैं. इस मन्दिर में वही मिट्टी का भागाकार विशाल पिंड है, जो यहाँ गंगा और गंडक (नारायणी) नदी के संगम स्थल पर विधमान है, जिसे देवी (शक्ति) का साक्षात् स्वरुप कहा जाता है ! इस जगह पर गंगा शिव रूप में लिंगाकार है, अतः इस क्षेत्र को शिव शक्ति क्षेत्र भी कहा जाता है ! लोग बताते है कि आमी में जब से मां अंबिका भवानी की पिंडी स्थापित हुयी थी, उस समय से हीं यहां मॉं दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित नहीं की जाती हैं।

बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशक डा. प्रकाश चरण प्रसाद का कहना है कि अम्बिका स्थान में जो मूर्ति है, वह प्रागैतिहासिक काल की है। मिट्टी की प्रतिमा यह साबित करती है कि यह पाषाण काल के पूर्व की है, क्योंकि तब तक पत्थरों से मूर्तियों के निर्माण की कला विकसित नहीं हुई थी। इसे वे मातृशक्ति का प्राचीन रूप मानते हैं और कहते हैं कि ऐसी प्रतिमाओं के लिए प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। उनका कहना है कि देवी की यह मूर्ति संगम स्थल पर स्थापित की गयी, क्योंकि धारा बदलने के पहले गंडक नदी यहीं गंगा में मिलती थी। वे इस स्थान को शिव और शक्ति का क्षेत्र बताते हुए कहते हैं कि यहाँ गंगा शिव-रूप में लिंगाकार है। इसके बाद गंडक से शक्ति का संबंध् जोड़ते हुए वे कहते हैं कि गंडक के उद्गम-स्थल से सप्त धराएँ निकली हैं जिनमें एक का नाम काली गंडक है। गंडक को लोग नारायणी भी कहते हैं और ये दोनों नाम देवी से संबंध्ति हैं। उनका कहना है कि देवी के मंदिर के लिए यह स्थान बहुत सोंच-समझ कर चुना गया और नौ दुर्गा की 9 पिण्डियों के साथ यहाँ एकादश रूद्र की भी स्थापना की गयी। इस संगम-स्थल को वे निर्णय भूमि मानते हैं जिसे साधना और सिद्धि के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

पंडित हिमांशु कुमार मिश्रा, जो की राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित समाजसेवी हैं. उन्होंने अपनी पुस्तक में माँ अंबिका भवानी की उत्पति और पौराणिक कहानी तथा महत्व एवं इस स्थान रेखांकित करने का सराहनीय प्रयास किया हैं. अंबिका स्थान (दिघवारा ) का जीर्णोद्धार और उसके महत्व का प्रचार प्रसार उनके जीवन का मकसद रहा है.

श्री मार्कण्डेय पुराण एवं दुर्गा शप्तशती से लेकर पंडित हिमांशु मिश्रा द्वारा लिखित माँ अम्बिका भवानी की कहानी को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !

माँ जगत जननी की कृपा हम सभी पर बनी रहे !!
जय हो जगत जननी आदी शक्ति माता अम्बिका भवानी की !! जय माता दी !!

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नमस्कार...!! इस खूबसूरत संकलन को आपलोगों के समक्ष ज्ञानवाटिका संपादन टीम के द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसके प्रधान सम्पादक और एडमिन विकास कुमार तिवारी जी हैं. इस खूबसूरत संग्रह को बनाने और आपके समक्ष लाने में कई दिन और कई रातों का सतत प्रयास शामिल है, और हम आगे भी इसी निष्ठा से आपके समक्ष महत्वपूर्ण तथा अनमोल जानकारियों को संकलित कर प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं...! इसके साथ ही हम इस बात के लिए भी आशान्वीत हैं की आप सभी अपना महत्वपूर्ण सुझाव देकर, इस खूबसूरत संकलन को और खूबसूरत बनाने में हमारी मदद अवश्य करेंगे !

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