उत्तराखंड के चार धामों (गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ) का विवरण एवं यात्रा गाइड !

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धार्मिक मान्याताओं के अनुसार भारत में चार धाम, चार पवित्र धार्मिक स्‍थलों (पुरी, रामेश्‍वरम, द्वारका और बद्रीनाथ) का एक समूह है जिसे 8वीं शदी में आदि शंकराचार्य ने एक सूत्र में पिरोया था ! इन चार धामों की यात्रा का हमारे सनातन धर्म में बहुत बड़ा महत्व है, हालाँकि इन चारों मंदिरों में से किसको परम स्‍थान दिया जाए इस बात का निर्णय करना नामुमकिन है। लेकिन इन सब में बद्रीनाथ सबसे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण और अधिक तीर्थयात्रियों द्वारा दर्शन करने वाला मंदिर है।

इसके अलावां भारतवर्ष के उत्तरांचल/उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में भी हिमालय पर्वत के ऊपर चार धाम के रूप में एक धार्मिक परिपथ बसा हुआ है, जिसे हम छोटा चार धाम या हिमालय के चार धाम के नाम से जानते हैं! इसके अंतर्गत (गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ) की यात्रा शामिल हैं! और इस चारधाम यात्रा का भी हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है, तथा हिन्दू मान्यतानुसार इनका दर्शन करना मोक्षदायी बताया गया है।

अब हम बात करते हैं की इस चारधाम के यात्रा की शुरुआत कैसे करें !

सबसे पहले यह पता कर लें कि यात्रा कब से शुरू है और कब तक चलेगी :

चार धाम की यात्रा हमेशा चालू नहीं रहती, प्रत्येक वर्ष सर्दियों में लगभग 6 महीने के लिए यह यात्रा रोक दी जाती है और गर्मियों में भी अत्यधिक बारिश होने पर यात्रा तत्काल रूप से कुछ दिनों के लिए रोक दी जाती है। इसलिए चार धाम की यात्रा प्लान करने से पहले इसकी सही टाइमिंग की जानकारी अवश्य जुटा लें ! इस जानकारी को जुटाने के पश्चात अब आप आगे की प्लानिंग शुरू कर सकते हैं !

यदि आप ग्रुप में या अपने परिवार के साथ जा रहे हैं तो सबसे पहले आप अपने साथ जाने वालों सभी लोगों की एक सूची तैयार कर ले और यदि आप चाहें तो सुविधानुसार किसी अच्छे ट्रेवल कम्पनी से पैकेज भी बुक कर सकते हैं. हाँलाकि ये ऑप्शन थोड़ा महंगा जरूर होगा लेकिन इसमें परेशानियों से काफी हद तक बच जाते हैं और यदि आपके टीम में एक्टिव, इनोवेटिव और एडवेंचर को पसंद करने वाले तथा छोटी मोती दिक्कतों से नहीं परेशान होने वाले लोग हैं तो फिर आप खुद से भी पूरी ट्रिप की प्लानिंग कर सकते हैं।

इस यात्रा की शुरुआत हम हरिद्वार या ऋषिकेश से करते हैं, हरिद्वार या ऋषिकेश तक पहुँचने के लिए आप सीधे यहाँ के लिए ट्रेन ले सकते हैं या फिर डायरेक्ट ट्रेन ना होने के केस में आप देहरादून तक की ट्रेन ले सकते हैं, यदि आप ट्रेन से देहरादून आते हैं तो यहाँ से आप हरिद्वार या ऋषिकेश टैक्सी या बस से सीधे पहुंच सकते हैं ! और यदि आप हवाई मार्ग से आना चाहते हैं तो आपको देहरादून की फ्लाइट लेनी होगी, फिर आप देहरादून से आप हरिद्वार या ऋषिकेश टैक्सी से आसानी से पहुँच सकते हैं !

अब घर से निकलने से पहले आप अच्छे से अपनी पैकिंग कर लें : जिसमे निम्नलिखित सामान अत्यंत आवश्यक हैं !

गर्म कपड़े : चूँकि ये धाम ऊँचे पहाड़ों में स्थित हैं इसलिए आपको अपने साथ गर्मी और ठंडी दोनों के हिसाब से कपड़े रखने होंगे। अगर आप मई-जून में जा रहे हैं तो दिन में तो बिना स्वेटर के काम चल जाएगा पर रात में गरम कपड़ों की ज़रूरत पड़ेगी। इसलिए सभी यात्री कम से कम दो जोड़ी स्वेटर/जैकेट, इनर, टोपी-मफलर आदि रख लें। छोटे बच्चों के लिए दस्ताने भी रख लेना सही रहेगा।

खाने-पीने की चीजें एवं अन्य सामान : आप अपनी सुविधानुसार रेडीमेड खाने पिने की चीजें भी साथ रख लें ये आपके बहुत काम आएँगी, इसके अलावां आप डेली यूज़ के आइटम्स जैसे ब्रश, शेविंग किट, शैम्पू , क्रीम, बॉडी लोशन, पेपर सोप, इत्यादि अवश्य रख लें। इसके अलांवा अत्यंत महत्वपूर्ण चीज है “टॉर्च” : तीन-चार लोगों के बीच में 1 टॉर्च ज़रूर रख लें। पहाड़ों में कई बार बिजली नहीं आती और कभी-कभी चढ़ाई करते वक़्त या उतरते समय भी अँधेरा हो जाने पर टॉर्च की बहुत ज्यादा जरुरत होती है !

रेन कोट : पहाड़ों में अक्सर दोपहर में बारिश होने लगती है इसलिए आप रेन कोट ले लें तो बेहतर होगा। वैसे आप चाहें तो धाम पर पहुँच कर भी सिर्फ 20 रुपये से लेकर हज़ार रूपये तक के रेन कोट खरीद सकते हैं।

जूते-चप्पल : आप ज्यादातर समय चप्पल या सैंडल में ही आराम महसूस करेगे लेकिन चढ़ाई के वक़्त जूते पहनना ज़रूरी है, इसलिए जूते-चप्पल ज़रूर रख लें।

जरुरी दवाईयां : बुखार, सर दर्द, उल्टी, लूज़ मोशन इत्यादि की जरुरी दवाईयां बच्चों और बड़ों के हिसाब से आप अपने साथ अवश्य रख लें।

अब आपकी पैकिंग कम्पलीट हो चुकी हैं, अब अपने प्लानिंग के अनुसार आप हरिद्वार/ऋषिकेश के लिए निकल लें ! हरिद्वार और ऋषिकेश में भी घूमने के लिए मनसा देवी मंदिर, हर की पौड़ी, लक्ष्मण झूला और अन्य दर्शनीय स्थान हैं। हर की पौड़ी अपनी शाम की गंगा आरती के लिए अत्यंत प्रसिद्द है, साथ ही आप ऋषिकेश में रिवर राफ्टिंग का मजा भी ले सकते हैं। तो मैं आपको ये सलाह दूंगा की आप चार धाम की यात्रा शुरू करने से पहले हरिद्वार और ऋषिकेश भी जरूर घूमें ! इसके बाद आप चारधाम की यात्रा हरिद्वार या ऋषिकेश से शुरू करें!

चार धाम की यात्रा में पहला पड़ाव यमुनोत्री है, यमुनोत्री पहुंचने के लिए आप हरिद्वार या ऋषिकेश से टैक्सी ले सकते हैं! हरिद्वार से यमुनोत्री की दुरी लगभग 262 किलोमीटर की है जिसमे टैक्सी आपको 256 किलोमीटर तक ले जाकर यमुनोत्री से करीब छः किलोमीटर पहले “जानकी चट्टी” छोर देगी, इसके बाद यहाँ से आपको छः किलोमीटर की चढ़ाई करनी होती है जिसे आप अपनी सुविधानुसार पैदल, खच्चर / घोड़े द्वारा, बास्केट/ टोकरी या पिट्ठू द्वारा अथवा पालकी के द्वारा पूरा कर सकते हैं!

Yamunotri

यमुनोत्री : बांदरपूंछ के पश्चिमी छोर पर पवित्र यमुनोत्री तथा यमुना मंदिर स्थित है। परंपरागत रूप से यह चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। इस मंदिर का निर्माण जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं शताब्दि में करवाया था। यमुनोत्री मंदिर के समीप कई गर्म पानी के सोते हैं जो विभिन्‍न पूलों से होकर गुजरते हैं, इनमें से सूर्य कुंड बहुत प्रसिद्ध है। कहा जाता है अपनी बेटी को आर्शीवाद देने के लिए भगवान सूर्य ने गर्म जलधारा का रूप धारण किया। श्रद्धालु इसी कुंड में चावल और आलू कपड़े में बांधकर कुछ मिनट तक छोड़ देते हैं, जिससे यह पक जाता है। तीर्थयात्री पके हुए इन पदार्थों को प्रसादस्‍वरूप घर ले जाते हैं। सूर्य कुंड के नजदीक ही एक शिला है जिसको ‘दिव्‍य शिला’के नाम से जाना जाता है। तीर्थयात्री यमुना जी की पूजा करने से पहले इस दिव्‍य शिला का भी पूजन करते हैं।

Gangotri

गंगोत्री : यमुनोत्री यमुनोत्री दर्शन के बाद चारधाम का दूसरा पड़ाव गंगोत्री है, यमुनोत्री से लौटकर आप बरकोट-उत्तरकाशी होते हुए तक़रीबन 200 किलोमीटर के दुरी तय कर गंगोत्री तक सीधे गाड़ी से जा सकते हैं और यहाँ आपको बहुत कम पैदल चलना पड़ता है। गंगोत्री भारत के पवित्र और आध्‍यात्मिक रूप से महत्‍वपूर्ण नदी गंगा का उद्गगम स्‍थल भी है। गंगोत्री में गंगा नदी को भागीरथी के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा भागीरथ के नाम पर इस नदी का नाम भागीरथी रखा गया था। पौराणिक कथाओं में यह भी कहा गया है कि राजा भागीरथ ही तपस्‍या करके माँ गंगा को पृथ्‍वी पर लाए थे। गंगोत्री में गंगा स्नान का बहुत अधिक महत्त्व है, अतः यहाँ स्नान अवश्य करें लेकिन यहाँ का पानी अत्यंत ठंडा होता है अतः बच्चों को स्नान ना करावें। गंगोत्री से ही गौमुख जाने का भी रास्ता है, जहाँ से गंगा नदी निकलती है। परन्तु यह मार्ग अत्यंत कठिन है और यहाँ जाने में अत्यधिक समय भी लगता है (फिर भी यदि आप जाना चाहते हैं, तो अवश्य जाएँ)। हालाँकि अत्यंत कठिन होने के कारण बहुत कम लोग ही गौमुख जाते हैं।

Kedarnath

केदारनाथ : यह गंगोत्री के बाद चार धाम की यात्रा का तीसरा पड़ाव है, गंगोत्री से केदारनाथ जाने के लिए आपको पहले वापस उत्तरकाशी आना होता है, उत्तरकाशी से रुद्रप्रयाग होते होते तक़रीबन 254 किलोमीटर की दुरी आप टैक्सी से कर सकते हैं, इसके बाद केदारनाथ के लिए 20 किलोमीटर की चढ़ाई करनी होती है ! जिसे आप जिसे आप अपनी सुविधानुसार पैदल, खच्चर / घोड़े द्वारा, बास्केट/ टोकरी या पिट्ठू द्वारा अथवा पालकी के द्वारा पूरा कर सकते हैं! और यदि आप चाहें तो हेलीकॉप्टर की सुविधा लेकर भी आप केदारनाथ पहुंच सकते हैं ! हेलीकॉप्टर का किराया एक तरफ से तक़रीबन 5,000 रुपये प्रति व्यक्ति आता है !

यदि आप 20 किलोमीटर की इस दुरी पैदल तय करते हैं तो यह आपके लिए अत्यंत कठिन सफर हो सकता है लेकिन इसका एक दूसरा पहलु ये भी है कि, जब आप पैदल जाते हैं तो आपको बहुत से ऐसे प्राकृतिक दृश्य (Natural Scenes) देखने को मिलते हैं जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते! तेज बहते झरने… हरी भरी पहाड़ियां… तेज बहती नदियाँ…हरे-भरे रास्ते…ये सब वास्तव में आपका मन मोह लेते हैं और आपकी थकान यूँही मिट सी जाती है, और कहीं कहीं पे तो ऐसा प्रतीत होता है मानो आप सचमुच बादलों के बीच चल रहे हैं! और ये सब अनुभव पैदल मार्ग पर यात्रा कर के ही मिल सकता है!

केदारनाथ में आपको सरकार द्वारा बनाये गए I-card की ज़रूरत पडती है। ये कार्ड आप वहां पहुँच कर या पहले भी बनवा सकते हैं, अमूमन ड्राइवर्स इसके बारे में जानते हैं और वे पहले ही आपका कार्ड बनवा देते हैं। यहाँ भक्तों की लम्बी कतार लगी होती है और अगर आप VIP नहीं हैं तो आपको काफी समय लाइन में बिताना होता है।

केदारनाथ मंदिर समुद्र तल से 11,746 फीट पर मंदाकिनी नदी के उद्गगम स्‍थल के समीप स्थित है, यह वही जगह है जहां आदि शंकराचार्य 32 वर्ष की आयु में समाधि में लीन हुए थे। केदारनाथ मंदिर न केवल आध्‍यात्‍म के दृष्टिकोण से वरन स्‍थापत्‍य कला में भी अन्‍य मंदिरों से भिन्‍न है। यह मंदिर कात्‍युरी शैली में बना हुआ है, तथा यह पहाड़ी के चोटि पर स्थित है। इसके निर्माण में भूरे रंग के बड़े पत्‍थरों का प्रयोग किया गया है तथा इसकी छत लकड़ी से बनी है, जिसके शिखर पर सोने का कलश है। मंदिर के बाह्य द्वार पर पहरेदार के रूप में नंदी की विशालकाय मूर्ति है।

केदारनाथ मंदिर को मूलतः तीन भागों में बांटा गया है – पहला : गर्भगृह, दूसरा : दर्शन मंडप (जहां पर दर्शानार्थी खड़े होकर पूजा करते हैं) और तीसरा : सभा मण्‍डप (जहाँ पर सभी तीर्थयात्री जमा होते हैं)। केदारनाथ मंदिर के खुलने का समय निर्धारित नहीं रहता है। हर साल शिवरात्री की तिथि के अनुसार पंच पुरोहित के द्वारा उखीमठ में इस बात का फैसला किया जाता है कि मंदिर कब खुलेगा। निर्धारित तिथि के अनुसार प्रत्येक वर्ष मंदिर खुलता है तथा प्रत्येक वर्ष यम द्वितीया या भाई दूज के दिन मंदिर को बंद कर दिया जाता है।

Badrinath

बद्रीनाथ : यह चार धाम यात्रा का चौथा एवं आखिरी पड़ाव है ! केदारनाथ से बद्रीनाथ पहुंचने के लिए आपको वापस रुद्रप्रयाग आना होता है और रुद्रप्रयाग से तक़रीबन 160 किलोमीटर तक गाड़ी से चलकर आप सीधे बद्रीनाथ पहुँचते हैं। बद्रीनाथ में भी गाड़ी अंत तक चली जाती है और आपको अधिक चलना नहीं पड़ता। यहाँ पहुँचने पर आपको गर्म कुण्ड में स्नान करने का अवसर मिलता है, जहाँ आप अपनी थकान मिटा कर श्री बद्री विशाल के दर्शन कर सकते हैं। इन चारो धामों में सबसे अधिक भीड़ यहीं होती है तथा यहाँ रात में ठंड भी बहुत ज्यादा रहती है।

श्री बद्रीनाथ मंदिर नर और नारायण पर्वतों के मध्‍य स्थित है, जो की समुद्र तल से 10,276 फीट की ऊंचाई पर है। अलकनंदा नदी इस मंदिर की खूबसुरती में चार चांद लगाती है। ऐसी मान्‍यता है कि भगवान विष्‍णु इस स्‍थान पर हमेशा ध्‍यनमग्‍न रहते हैं। इस मंदिर का निर्माण आज से ठीक दो शताब्‍दी पहले गढ़वाल के राजा के द्वारा किया गया था। यह मंदिर शंकुधारी शैली में बना हुआ है, जिसकी ऊंचाई लगभग 15 मीटर है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान् विष्‍णु के साथ नर और नारायण ध्‍यान की स्थिति में विराजमान हैं।

केदारनाथ की तरह इस मंदिर के भी तीन भाग हैं- गर्भगृह, दर्शन मंडप (पूजा करने का स्‍थान) और सभा गृह (जहां श्रद्धालु एकत्रित होते हैं)। वेदों और ग्रंथों में बद्रीनाथ के संबंध में कहा गया है कि, ‘स्‍वर्ग और पृथ्‍वी पर अनेक पवित्र स्‍थान हैं, लेकिन बद्रीनाथ इन सभी में अग्रगण्य है’। बद्रीनाथ के बिलकुल करीब आपको गणेश गुफा, व्यास गुफा और भीम सेतु के दर्शन करने को भी मिलेंगे। माना जाता है कि महर्षि व्यास और गणेश जी ने इन्ही गुफाओं में महाभारत को लिपिबद्ध किया था और भीम सेतु के बारे में मान्यता है कि जब पांडव स्वर्ग की ओर बढ़ रहे थे तब द्रौपदी सरस्वती नदी नहीं पार कर पा रही थीं, इसलिए महबली भीम ने एक बड़ी सी चट्टान उठा कर नदी पर रख दी जिस पर चल कर आसानी से नदी पार की जा सकती थी। भीम के पैरों के निशाँ आज भी वहां देखने को मिलते हैं, और अभी भी लोग इस सेतु का प्रयोग करते हैं।

बद्रीनाथ के दर्शन के पश्चात आप यहाँ से सीधे हरिद्वार या ऋषिकेश के लिए वापस निकल सकते हैं, यहाँ से हरिद्वार की दुरी लगभग 310 किलोमीटर तथा ऋषिकेश की दुरी लगभग 290 किलोमीटर की है ! और इस तरह आपकी हिमालय के चारधाम की यात्रा संपन्न होती है !

हर हर महादेव !

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नमस्कार...!! इस खूबसूरत संकलन को आपलोगों के समक्ष ज्ञानवाटिका संपादन टीम के द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसके प्रधान सम्पादक और एडमिन विकास कुमार तिवारी जी हैं. इस खूबसूरत संग्रह को बनाने और आपके समक्ष लाने में कई दिन और कई रातों का सतत प्रयास शामिल है, और हम आगे भी इसी निष्ठा से आपके समक्ष महत्वपूर्ण तथा अनमोल जानकारियों को संकलित कर प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं...! इसके साथ ही हम इस बात के लिए भी आशान्वीत हैं की आप सभी अपना महत्वपूर्ण सुझाव देकर, इस खूबसूरत संकलन को और खूबसूरत बनाने में हमारी मदद अवश्य करेंगे !

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