कई मर्जों का अकेला एक अचूक समाधान है “सूर्य नमस्कार” !

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Surya Namaskar

कई मर्जों का अकेला एक अचूक समाधान है “सूर्य नमस्कार” !

जी हाँ, योग विद्या के अंतर्गत आनेवाले सम्पूर्ण योगासनों में “सूर्य नमस्कार” को सर्वश्रेष्ठ माना गया है ! मात्र “सूर्य नमस्कार” के करने से ही, किसी भी साधक को सम्पूर्ण योग व्यायाम का लाभ प्राप्त होता है, तथा इसके निरंतर अभ्यास से साधक का शरीर निरोगी और स्वस्थ बनता है। साथ ही, इसे बच्चों से लेकर वृद्ध तक किसी भी उम्र के व्यक्ति आराम से कर सकते हैं।

तो आइये जानते हैं, की सूर्य नमस्कार को करने की प्रक्रिया क्या है तथा इसमें कौन कौन से आसन सम्मिलित हैं !

वैसे तो सूर्य नमस्कार को करने के लिए प्रातः काल का समय सर्वश्रेष्ठ होता है, लेकिन यदि आप इसे प्रातः में करने में असमर्थ हैं तो अपनी सुविधानुसार किसी दूसरे समय में भी कर सकते हैं ! यदि आप इसका अत्यधिक लाभ प्रातः करना चाहते हैं, तो प्रातः काल में उठकर नित्य कर्मों, स्नान आदि से निवृत होकर किसी खुले स्थान में चले जाएँ ! जहाँ से आप सूर्य को भी देख सकें और जहाँ आपको सुबह सुबह की स्वच्छ हवा मिले !

मूलतः सूर्य नमस्कार के अंतर्गत 12 आसन सम्मिलित हैं, जिसमे हर आसन के साथ साथ एक मंत्र का उच्चारण किया जाता है ! जिसमे प्रत्येक मंत्र में सूर्य के अलग अलग नामों का उच्चारण किया जाता है। हालांकि हर मंत्र का एक ही सरल अर्थ है- सूर्य को (मेरा) नमस्कार है। इसके अलावा सूर्य नमस्कार की शुरुआत करने से पहले एक मंत्र का उच्चारण करते हुए सूर्य की प्रार्थना की जाती हैं तथा सबसे अंत में पुनः एक मंत्र के साथ सूर्य को नमस्कार पूर्वक इस आसन का महत्व बताता हुआ एक श्लोक का उच्चारण किया जाता हैं। (हालांकि यदि आप हिन्दू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म के अनुयायी हैं या किसी अन्य कारणों से आपको मंत्र उच्चारण में गुरेज है तो आप इसे बिना मन्त्रों के भी कर सकते हैं) !

तो अब सूर्य नमस्कार की शुरुआत करने से पहले, दोनों हाथ जोड़कर सीधे खड़े होकर सूर्य को ध्यान करते हुए निचे दिए इस मंत्र का उच्चारण करें !

ॐ ध्येयः सदा सवितृ-मण्डल-मध्यवर्ती, नारायण: सरसिजासन-सन्निविष्टः।
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी, हारी हिरण्मयवपुर्धृतशंखचक्रः ॥

इसके बाद अब सूर्य नमस्कार की शुरुआत की जाती है, जिसमे क्रमशः बारह विभिन्न आसनो का अभ्यास किया जाता है, जो निम्नलिखित है :

Surya Namaskar Steps

(1) प्रणामासन : इस आसन को करने के लिए दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों। अब अपनी आँखों को बंद करें, तथा अपना ध्यान ‘आज्ञा चक्र’ पर केंद्रित करके ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ मित्राय नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

(2) हस्त उत्तानासन : इस आसन में अपने श्वास को भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। अब अपने ध्यान को गर्दन के पीछे ‘विशुद्धि चक्र’ पर केन्द्रित करें, एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ रवये नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

(3) उत्तानासन : इस आसन में अब श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए खुद को आगे की ओर झुकाएं। हाथ को गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे ले जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे ‘मणिपूरक चक्र’ पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें,एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ सूर्याय नमः’ मंत्र के द्वारा करें। (कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक इस आसान को न करें)।

(4) अश्व संचालनासन : इस आसन में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। तथा छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को ‘स्वाधिष्ठान’ अथवा ‘विशुद्धि चक्र’ पर ले जाएँ, एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ भानवे नमः’ मंत्र के द्वारा करें। तथा इस आसन के दौरान अपनी मुखाकृति को सामान्य रखें।

(5) चतुरंग दंडासन : इस आसन में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। ध्यान रहे आपके दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। अब पीछे की ओर अपने शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं। गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। ध्यान ‘सहस्रार चक्र’ पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें, एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ खगाय नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

(6) अष्टांग नमस्कार : इस आसन में श्वास भरते हुए शरीर को पृथ्वी के समानांतर, सीधा साष्टांग दण्डवत करें और पहले घुटने, छाती और अपने माथे को पृथ्वी पर लगा दें। अब अपने नितम्बों को थोड़ा ऊपर उठा दें। श्वास छोड़ दें। और ध्यान को ‘अनाहत चक्र’ पर टिका दें। अब श्वास की गति को सामान्य करें, एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ पूष्णे नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

(7) भुजंगासन : इस आसन में धीरे-धीरे श्वास को भरते हुए अपने छाती को आगे की ओर खींचते हुए हाथों को सीधे कर दें। अब अपने गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं। ध्यान रखें की आपके घुटने पृथ्वी का स्पर्श करते हुए हों तथा आपके पैरों के पंजे खड़े रहें। मूलाधार को खींचकर वहीं पर अपने ध्यान को टिका दें, एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ हिरण्यगर्भाय नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

(8) अधोमुक्त श्वानासन : इस आसन में अब श्वास को धीरे-धीरे बाहर निष्कासित करते हुए अपने दाएं पैर को भी पीछे ले जाएं। ध्यान रहे की आपके दोनों पैरों की एड़ियां परस्पर मिली हुई हों। अब पीछे की ओर अपने शरीर को खिंचाव दें और एड़ियों को पृथ्वी पर मिलाने का प्रयास करें। अपने नितम्बों को अधिक से अधिक ऊपर उठाएं तथा गर्दन को नीचे झुकाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाएं। अब अपना ध्यान ‘सहस्रार चक्र’ पर केन्द्रित करने का अभ्यास करें एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ मरीचये नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

(9) अश्व संचालनासन : चौथे आसन को ही यहाँ पुनः दोहराया जाता है, बस मंत्र बदल जाता है। अतः पहले की भाँती ही इस आसन में श्वास को भरते हुए बाएं पैर को पीछे की ओर ले जाएं। तथा छाती को खींचकर आगे की ओर तानें। गर्दन को अधिक पीछे की ओर झुकाएं। टांग तनी हुई सीधी पीछे की ओर खिंचाव और पैर का पंजा खड़ा हुआ। इस स्थिति में कुछ समय रुकें। ध्यान को ‘स्वाधिष्ठान’ अथवा ‘विशुद्धि चक्र’ पर ले जाएँ, एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ आदित्याय नमः’ मंत्र के द्वारा करें। तथा इस आसन के दौरान अपनी मुखाकृति को सामान्य रखें।

(10) उत्तानासन : पुनः यहाँ तीसरे आसन की स्थिति में श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालते हुए आगे की ओर झुकाएं। हाथ को गर्दन के साथ, कानों से सटे हुए नीचे ले जाकर पैरों के दाएं-बाएं पृथ्वी का स्पर्श करें। घुटने सीधे रहें। माथा घुटनों का स्पर्श करता हुआ ध्यान नाभि के पीछे ‘मणिपूरक चक्र’ पर केन्द्रित करते हुए कुछ क्षण इसी स्थिति में रुकें,एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ सवित्रे नमः’ मंत्र के द्वारा करें। (कमर एवं रीढ़ के दोष वाले साधक इस आसान को न करें)।

(11) हस्त उत्तानासन : पुनः यहाँ दूसरे आसन की स्थिति में अपने श्वास को भरते हुए दोनों हाथों को कानों से सटाते हुए ऊपर की ओर तानें तथा भुजाओं और गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। अब अपने ध्यान को गर्दन के पीछे ‘विशुद्धि चक्र’ पर केन्द्रित करें, एवं ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ अर्काय नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

(12) प्रणामासन : इस आसान में पुनः पहले आसन को दोहराया जाता है। अतः पहले आसान की स्थिति में दोनों हाथों को जोड़कर सीधे खड़े हों। अब अपनी आँखों को बंद करें, तथा अपना ध्यान ‘आज्ञा चक्र’ पर केंद्रित करके ‘सूर्य भगवान’ का आह्वान ‘ॐ भास्कराय नमः’ मंत्र के द्वारा करें।

इसके बाद पुनः दोनों हाथ जोड़कर सीधे खड़े होकर सूर्य को ध्यान करते हुए निचे दिए इस मंत्र का उच्चारण करें !

ॐ श्रीसवितृसूर्यनारायणाय नमः।

आदित्यस्य नमस्कारान् ये कुर्वन्ति दिने दिने।
आयुः प्रज्ञा बलं वीर्यं तेजस्तेषां च जायते ॥

इस प्रकार सूर्य को आदरपूर्वक प्रणाम तथा धन्यवाद करते हुए इन्ही मन्त्रों के साथ सूर्य नमस्कार आसान का समापन किया जाता है !

सूर्य नमस्कार से होने वाले लाभ :

“सूर्य नमस्कार” हमारे पुरे शरीर में रक्त के परिसंचरण में सुधार लाता है तथा इसकी उपरोक्त बारह स्थितियाँ हमारे शरीर के संपूर्ण अंगों की तमाम विकृतियों को दूर करके हमारे शरीर को निरोग बना देती हैं। अतः “सूर्य नमस्कार” की यह पूरी प्रक्रिया हमारे शरीर के लिए अत्यधिक लाभकारी है। अगर आप इसका निरंतर अभ्यास करते हैं, तो आपके हाथों एवं पैरों के दर्द दूर हो जाते हैं तथा उनमें सबलता आ जाती है। इसके अलावा “सूर्य नमस्कार” के निरंतर अभ्यास से आपके गर्दन, फेफड़े तथा पसलियों की मांसपेशियां भी सशक्त हो जाती हैं, साथ ही इससे आपके शरीर की फालतू चर्बी भी कम होती है।

“सूर्य नमस्कार” को निरंतर करने से सभी प्रकार के त्वचा रोग समाप्त हो जाते हैं तथा पुनः इनके होने की संभावना भी समाप्त हो जाती है। “सूर्य नमस्कार” के निरंतर अभ्यास से कब्ज आदि उदर रोग भी समाप्त होते हैं, और पाचनतंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि होती है। “सूर्य नमस्कार” को नियमित रूप से करने पर हमारे शरीर की छोटी – बड़ी सभी नसें एवं नाड़ियां क्रियाशील हो जाती हैं, इसलिए आलस्य, अतिनिद्रा आदि विकार हमारे शरीर से स्वतः दूर हो जाते हैं। इसके साथ ही यह शरीर के सभी प्रणालियों को संतुलित करता है तथा हमे मानसिक शांति प्रदान करता है

सावधानियाँ :

(1) सूर्य नमस्कार की तीसरी व पांचवीं स्थितियां सर्वाइकल एवं स्लिप डिस्क वाले रोगियों के लिए वर्जित हैं।
(2) यदि आपको बुखार अथवा जोड़ों में सूजन हो, तो आपको सूर्य नमस्कार नहीं करना चाहिए।
(3) हाई ब्लड प्रेशर, ह्रदय रोग, हार्निया तथा मेरुदंड के रोगियों को भी सूर्य नमस्कार नहीं करना चाहिए।
(4) मासिक धर्म के समय तथा गर्भावस्था के चार महीने बाद सूर्य नमस्कार नहीं करना चाहिए।

हम उम्मीद करते हैं की, सम्पूर्ण स्वास्थ उपयोगिता पर प्रकाश डालता हमारा ये संकलन आपको बेहद पसंद आया होगा ! और यदि आप हमे कोई सुझाव देना चाहते हैं अथवा हमसे कोई प्रश्न पूछना चाहते हैं तो कमेंट बॉक्स के माध्यम से दे अथवा पूछ सकते हैं ! धन्यवाद् !!

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नमस्कार...!! इस खूबसूरत संकलन को आपलोगों के समक्ष ज्ञानवाटिका संपादन टीम के द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसके प्रधान सम्पादक और एडमिन विकास कुमार तिवारी जी हैं. इस खूबसूरत संग्रह को बनाने और आपके समक्ष लाने में कई दिन और कई रातों का सतत प्रयास शामिल है, और हम आगे भी इसी निष्ठा से आपके समक्ष महत्वपूर्ण तथा अनमोल जानकारियों को संकलित कर प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं...! इसके साथ ही हम इस बात के लिए भी आशान्वीत हैं की आप सभी अपना महत्वपूर्ण सुझाव देकर, इस खूबसूरत संकलन को और खूबसूरत बनाने में हमारी मदद अवश्य करेंगे !

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