माता सती के पवित्र 51 शक्ति पीठों की कहानी (Know about holy shakti peethas of goddess sati)!

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holy shakti peethas of goddess sati

प्राचीन पुराणों और इतिहास के अनुसार भगवान शिव की पत्नी उमा(सती), ब्रह्मा जी के पुत्र प्रजापति दक्ष तथा प्रसूति कि सोलहवीं कन्या थी, जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। दक्ष द्वारा आद्या शक्ति माता को कन्या के रूप में प्राप्ति हेतु, कठिन साधना करने के फलस्वरूप, आदि शक्ति काली ने सती स्वरूप में दक्ष ये यहाँ जन्म धारण किया।

ब्रह्मा जी के कहने पर, दक्ष ने अपनी बेटी सती का विवाह शिव जी से किया, परन्तु वे इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे। एक बार किसी उत्सव पर दक्ष के पधारने पर, वहां पहले से ही बैठे भगवान शिव ने उन का सत्कार नहीं किया, परन्तु वह उपस्थित समस्त लोगो ने, उन का हाथ जोड़ वंदन किया। इस पर दक्ष क्रुद्ध हो गए, वे ससुर या पिता सामान थे। साथ ही, शिव जी का सम्बन्ध विध्वंसक वस्तुओं से होना भी एक कारण हैं। श्मशान में निवास करना, चिता भस्म शरीर में लगाना, खोपडीओ तथा हड्डीओं की माला धारण करना, सर्पो को अपना आभूषण बनाना, गांजा तथा चिल्लम पीना इत्यादि अमंगलकारी वस्तुओं से सम्बन्ध रखते थे। शिव जी दरिद्र थे, मारे हुऐ पशुओ के खाल पहनते थे, चिमटा, खप्पर, कमंडल, सांड, हड्डियां ही उनकी संपत्ति थी। उनके साथ डरावने भूत तथा प्रेत इत्यादि अशुभ शक्तियां रहती थी। साथ ही शिव जी के द्वारा ब्रह्मा जी का एक सर कट गया था, ब्रह्मा जी पांच मस्तकों से युक्त थे, अतः शिव जी को दक्ष ब्रह्म हत्या का दोषी मानते थे।

एक बार प्रजापति दक्ष (जो ब्रह्मा जी के पुत्र थे), ने ‘बृहस्पति श्रवा’ नाम के यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने तीनो लोको से समस्त प्राणिओ, ऋषियो, देवी-देवताओ इत्यादियों को निमंत्रित किया। दक्ष, भगवान शिव से घृणा करते थे परिणामस्वरूप भगवान शिव सहित उन से सम्बंधित किसी को भी, अपने यज्ञ आयोजन में आमंत्रित नहीं किया।

देवी सती ने जब देखा की तीनो लोको से समस्त प्राणी उन के पिता जी के यज्ञ आयोजन में जा रहे है, उन्होंने अपने पति भगवान शिव ने अपने पिता के घर, यज्ञ आयोजन में जाने कि अनुमति मांगी। भगवान शिव दक्ष के व्यवहार से परिचित थे, उन्होंने सती को अपने पिता के घर जाने की अनुमति नहीं दी तथा नाना प्रकार से उन्हें समझाने की चेष्टा की। परन्तु देवी सती नहीं मानी, अंततः भगवान शिव ने उन्हें अपने गणो के साथ जाने की अनुमति दे दी। सती अपने पिता दक्ष से उन के यज्ञानुष्ठान स्थल में घोर अपमानित हुई। दक्ष ने अपनी पुत्री सती को स्वामी सहित, खूब उलटा सीधा कहा। परिणामस्वरूप, देवी अपने तथा स्वामी के अपमान से तिरस्कृत हो, यज्ञ में आये सम्पूर्ण यजमानो के सामने देखते ही देखते अपनी आहुति यज्ञ कुण्ड में दे दी तथा देवी की मृत्यु हो गई।

भगवान शिव को जब इस घटना का ज्ञात हुआ, वो अत्यंत क्रुद्ध हो गए। उन्होंने अपने जटा के एक टुकड़े से वीरभद्र को प्रकट किया, जो स्वयं महाकाल के ही स्वरूप थे, साथ ही महाकाली को भी। उन्होंने वीरभद्र तथा महाकाली को अपने गणों के साथ, दक्ष यज्ञ स्थल में सर्वनाश करने की आज्ञा दी। भगवान शिव के आदेशानुसार दोनों ने यज्ञ का सर्वनाश कर दिया, दक्ष का गाला काट उस के सर की आहुति यज्ञ कुण्ड में दे दी।

तदनंतर भगवान शिव यज्ञ स्थल में आये तथा अपनी प्रिय पत्नी सती के शव को कंधे पर उठा, तांडव नृत्य करने लगे। (शिव का नटराज स्वरूप, तांडव नित्य का ही प्रतिक हैं।) शिव के क्रुद्ध हो तांडव नृत्य करने के परिणामस्वरूप, तीनो लोको में हाहाकार मच गया तथा तीनो लोगो का विध्वंस होने लगा। तीनो लोको को भय मुक्त करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से, सती के मृत देह के टुकड़े कर दिए तथा वो भारत वर्ष के विभिन्न स्थानों में पतित हुऐ। जो देवी सती के पवित्र 51 शक्ति पीठो के नाम से विख्यात हैं !

तथा जिस स्थान पर सती ने हवनकुंड में कूद कर अपना देह त्यागा था उस स्थान को मूर्धन्य सिद्धपीठ तथा साक्षात् शक्तिपीठ मानते हैं, जो की बिहार के सारण जिले के आमी गांव में स्थित है ! इस स्थान पर देवी की कोई मूर्ति नहीं अपितु मिटटी का पिंड है जो की राजा सुरथ और वैश्य के द्वारा अत्यंत प्राचीन काल में तपश्या के दौरान बनाया गया था तथा इसका वर्णन दुर्गा सप्तशती में किया गया है, जिसे जगत जननी माँ अम्बिका भवानी के नाम से जानते हैं!

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शक्ति पीठ के सन्दर्भ में कुछ और भी तथ्य मिलते हैं, जिसमे :

शिव चरित्र के अनुसार, सती शक्ति पीठों की संख्या ५१ हैं।
कालिका पुराण के अनुसार, सती शक्ति-पीठों की संख्या २६ हैं।
श्री देवी भागवत, पुराण के अनुसार, सती शक्ति-पीठों की संख्या १०८ हैं।
तंत्र चूड़ामणि तथा मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, सती शक्ति-पीठों की संख्या ५२ हैं।

सती के पवित्र 51 शक्ति पीठ :

(1) हिंगलाज शक्तिपीठ, बलूचिस्तान, पाकिस्तान।
हिंगलाज शक्तिपीठ, हिंगलाज या हिंगुला नमक स्थान में कराची से 125 कि. मी. उत्तर-पूर्व, हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान के मध्य में स्थित हैं। यहाँ सती का ब्रह्मरंध्र (सिर के ऊपर का भाग या कपाल) गिरा था। यहाँ देवी ‘कोट्टरी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘भीमलोचन’ के रूप में अवस्थित हैं।

(2) शिवहारकराय या करविपुर शक्तिपीठ, कराची, पाकिस्तान।
शिवहारकराय या करविपुर शक्ति पीठ पाकिस्तान के कराची में परकै रेलवे स्टेशन के पास स्थित हैं। यहाँ सती की आँखें गिरी थी। यहाँ देवी ‘महिषमर्दिनी’ के रूप में तथा भैरव ‘क्रोधीश’ के रूपमें अवस्थित हैं।

(3) सुंगधा शक्तिपीठ, बरिसाल, बांग्लादेश।
सुगंधा शक्तिपीठ, बांग्लादेश के बरिसाल जिले से 20 कि. मी. उत्तर में शिकारपुर नामक स्थान में स्थित हैं। यहाँ सती की नाक गिरी थी और यहां देवी ‘सुगंधा’ या ‘तारा एकजटा’ स्वरूप के रूप में विद्यमान हैं तथा यहाँ भैरव ‘त्र्यंबक’ रूप में अवस्थित हैं।

(4) महामाया शक्तिपीठ, अमरनाथ, पहलगाम, जम्मू और कश्मीर, भारत।
महामाया शक्तिपीठ भारतवर्ष के जम्मू और कश्मीर में पहलगाम जिले में स्थित हैं। यहाँ सती का गला गिरा था, यहां देवी ‘महामाया’ के रूप में तथा भैरव ‘त्रिसन्ध्येश्वर’ के रूप में अवस्थित हैं। भगवान शिव के इस पवित्र गुफा में हिम-लिंग प्राकृतिक रूप से निर्मित होती हैं, इस स्थान में शिव जी ने अपनी पत्नी पार्वती को जीवन और मरण चक्र से सम्बंधित महान रहस्य को समझाया था। यहाँ अपने आप बनने वाली अन्य दो हिम-संरचनायें माता पार्वती और उनके पुत्र गणेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। अमरनाथ के दर्शन के साथ श्रावण पूर्णिमा पर इस शक्ति पीठ का भी दर्शन किया जाता हैं।

(5) ज्वाला शक्तिपीठ, ज्वालामुखी (कांगड़ा), हिमाचल प्रदेश, भारत।
यह शक्तिपीठ ज्वालामुखी (जो की कांगड़ा घाटी के दक्षिण में 30 कि. मी. की दुरी पर है) में स्थित हैं। यह स्थान भारत के एक बहु प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के रूप में विख्यात हैं। मान्यता है की पांडवों ने इस पवित्र पीठ की खोज की थीं तथा यहाँ सती की जीभ गिरी थी। यहाँ देवी ‘अंबिका’ या ‘सिद्धिदा’ रूप में तथ भैरव ‘उन्मत्त’ रूप में अवस्थित हैं। देवी के मंदिर में दर्शन प्राकृतिक ज्वाला या लौ के रूप में होती हैं एवं यह लौ चट्टानों की परत के नीचे से सर्वदा प्रज्वलित होती रहती हैं।

(6) त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ, जालंधर, पंजाब, भारत।
यह शक्तिपीठ भारत में पंजाब राज्य के जालंधर रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर दूर जालंधर शहर में स्थित हैं। यहाँ सती का बांया वक्ष गिरा था, यहाँ देवी ‘त्रिपुरमालिनी’ के रूप में तथा भैरव ‘भीषण’ के रूप में अवस्थित हैं।

(7) अम्बाजी शक्तिपीठ, बनासकांठा, गुजरात, भारत।
अम्बाजी शक्तिपीठ पालनपुर से लगभग 65 कि. मी. तथा माउंट आबू से लगभग 45 किलोमीटर दूर, गुजरात-राजस्थान सीमा पर, श्री अमीरगढ़ से 42 कि. मी. और बनासकांठा जिले में कडियाद गांव से 50 कि. मी. की दुरी पर स्थित हैं। यहाँ सती का हृदय गिरा था। यहाँ देवी ‘अम्बाजी’ के रूप में और भैरव ‘बटुक भैरव’ के रूप में अवस्थित हैं। यहाँ पर देवी ‘श्री यंत्र’ के रूप में अवस्थित हैं और केवल इसी रूप में पूजिता हैं, यहाँ किसी भी प्रकार की कोई प्रतिमा नहीं हैं।

(8) गुजयेश्वरी शक्तिपीठ, काठमांडू, नेपाल।
गुजयेश्वरी शक्तिपीठ नेपाल की राजधानी काठमांडू में पशुपति नाथ मंदिर के निकट, बागमती नदी के तट पर स्थित हैं। यहाँ सती के दोनों घुटने गिरे थे। यहाँ देवी ‘महाशिरा’ के रूप में तथा भैरव ‘कपाली’ के रूप में अवस्थित हैं।

(9) दाक्षायनी शक्तिपीठ, कैलाश पर्वत, तिब्बत, चीन।
यह शक्तिपीठ तिब्बत में कैलाश पर्वत, मानसरोवर (चीन) के पास एक शिला के रूप में विद्यमान हैं। यहाँ सती का दायाँ हाथ गिरा था। यहाँ देवी ‘दाक्षायनी (दक्ष-यज्ञ विध्वंस करने वाली)’ के रूप में तथा भैरव ‘अमर’ के रूप में अवस्थित हैं।

(10) बिराज शक्तिपीठ, जाजपुर, भुवनेश्वर, ओडिशा, भारत।
बिराज शक्तिपीठ, भारत के ओडिशा राज्य में भुवनेश्वर से उत्तर दिशा में लगभग 125 कि. मी. की दुरी पर स्थित हैं। यहाँ सती की नाभि गिरी थी। यहाँ देवी विरजा और गिरीजा के नाम से पूजित हैं तथा यहाँ देवी ‘विमला’ के रूप में तथा भैरव ‘जगन्नाथ’ के रूप में अवस्थित हैं।

(11) गंडकी चंडी शक्तिपीठ, मुक्तिनाथ, पोखरा, नेपाल।
गंडकी चंडी शक्तिपीठ गंडकी नदी के किनारे नेपाल में मुक्तिनाथ, धवलगिरी में स्थित हैं। यहाँ सती का मस्तक गिरा था। यहाँ देवी ‘गंडकी-चंडी’ के रूप में तथा भैरव ‘चक्रपाणी’ के रूप में अवस्थित हैं।

(12) बहुला शक्तिपीठ, बर्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत।
यह शक्तिपीठ, भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के वर्धमान जिले में केतुग्राम, कटवा में अजय नदी के तट पर स्थित हैं। यहाँ सती का बाँया हाथ गिरा था। यहाँ देवी ‘बहुला देवी’ के रूप में तथा भैरव ‘भीरुक या सर्व-सिद्धिदायक भैरव’ के रूप में अवस्थित हैं। यहाँ देवी अपने दोनों पुत्रों कार्तिक और गणेश के साथ विद्यमान हैं।

(13) मंगल चंडिका शक्तिपीठ, बर्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत।
मंगल चंडिका शक्तिपीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में बर्द्धमान जिले के गुस्कारा के उजनी ग्राम में स्थित हैं। यहाँ सती की दाहिनी कलाई गिरी थी। यहाँ देवी ‘मंगल-चंडिका या मंगल चंडी’ के रूप में और भैरव ‘कपिलाम्बर’ के रूप में अवस्थित हैं।

(14) त्रिपुरेश्वरी शक्तिपीठ, उदयपुर, त्रिपुरा, भारत।
त्रिपुरेश्वरी शक्तिपीठ, अगरतला (भारत के त्रिपुरा राज्य की राजधानी) से 55 कि. मी. दूर उदयपुर नमक स्थान पर राधा किशोरपुर गांव में स्थित हैं तथा माता-बाड़ी के नाम से प्रसिद्ध हैं। इसे बहुत ही शक्तिशाली तंत्र शक्ति पीठ कहा जाता हैं। यहाँ सती का दायां पैर गिरा था। यहाँ देवी ‘त्रिपुरेश्वरी या त्रिपुर सुंदरी’ तथा भैरव ‘त्रिपुरेश’ के रूप में अवस्थित हैं।

(15) भवानी या चन्द्रनाथ शक्तिपीठ, चिटगांव, बांग्लादेश।
भवानी या चन्द्रनाथ शक्तिपीठ, सीताकुंड चन्द्रनाथ मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध हैं, यह पीठ बांग्लादेश के चंद्र-नाथ पर्वत के पास सीताकुंड स्टेशन, चटगांव, पर स्थित हैं। यहाँ सती की दायीं भुजा गिरी थी। यहाँ देवी ‘भवानी’ के रूप में तथा भैरव ‘चंद्रशेखर’ के रूप में अवस्थित हैं।

(16) भ्रामरी या त्रिसोता शक्तिपीठ, वोड़ागंज, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल, भारत।
भ्रामरी या त्रिसोता शक्तिपीठ, भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में जलपागुड़ी जिले के वोड़ागंज ग्राम में तीस्ता नदी के तट पर स्थित हैं। यहाँ सती का बायाँ पैर गिरा था, यहाँ देवी ‘भ्रामरी या त्रिश्रोता’ के रूप में तथा भैरव ‘अंबर’ के रूप में अवस्थित हैं।

(17) कामाख्या शक्तिपीठ, कामाख्या, आसाम, भारत।
कामाख्या शक्ति पीठ, भारत का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण तंत्र पीठ है। यह आसाम राज्य की राजधानी गुवाहाटी के नील-पर्वत या नीलांचल क्षेत्र में स्थित हैं। यहाँ सती की योनि(प्रजनन अंग) गिरी थीं। यहाँ देवी ‘कामाख्या’ तथा भैरव ‘उमानंद’ के रूप में अवस्थित हैं। यह तीर्थ देव शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया था, यहाँ देवी की कोई प्रतिमा नहीं हैं। जिस स्थान पर देवी की योनि गिरी थीं, वहाँ सर्वदा ही प्राकृतिक जल श्रोत का प्रवाह होता रहता हैं एवं वही पर देवी की पूजा की जाती हैं।

(18) जुगाड़्या शक्तिपीठ, खीरग्राम, बर्द्धमान, पश्चिम बंगाल, भारत।
जुगाड़्या शक्तिपीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में बर्द्धमान जिले के खीरग्राम गांव में स्थित है। यहाँ सती के दाहिने पैर का अँगूठा गिरा था। यहाँ देवी ‘जुगाड़्या शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘क्षीर खंडक’ के रूप में अवस्थित हैं।

(19) कालिका शक्तिपीठ, कोलकाता (कलकत्ता), पश्चिम बंगाल, भारत।
कालिका शक्तिपीठ, भारतवर्ष के पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित है, यह जगह कोलकाता में काली-घाट के नाम से प्रसिद्ध हैं। यहाँ सती के दाहिने पैर की चार उँगलियाँ गंगा नदी के तट पर गिरी थी। यह देवी सती के पीठों के मध्य बहुत प्रसिद्ध पीठ हैं। यहाँ देवी ‘महा-काली’ के रूप में तथा भैरव ‘नकुलेश्वर” के रूप में अवस्थित हैं। इस मंदिर में देवी काली की प्रतिमा ब्रह्मा बेदी पर प्रतिष्ठित हैं, जिस बेदी पर बैठकर ब्रह्मा जी ने आदि शक्ति के निमित्त तपस्या की थी।

(20) ललिता या अलोपी शक्तिपीठ, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत।
ललिता या अलोपी शक्तिपीठ को प्रयाग शक्तिपीठ के नाम से भी जाना जाता हैं। यहाँ सती के दोनों हाथों की उंगलियां गिरी थीं। यहाँ देवी ‘ललिता शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘वभ’ के रूप में अवस्थित हैं।

(21) जयंती शक्तिपीठ, कलजोरे बौरभग गांव, सिलेट जिला, बांग्लादेश।
जयंती शक्तिपीठ, बांग्लादेश के कलजोरे बौरभग गाँव के पास जयंतियापुर, सिलेट जिले में स्थित है। यहाँ सती की बाई जाँघ गिरी थीं। यहाँ देवी ‘जयंती शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘क्रमदीश्वर’ के रूप में अवस्थित हैं।

(22) विमला शक्तिपीठ, मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल, भारत।
विमला शक्तिपीठ भारत में पश्चिम बंगाल राज्य के मुर्शिदाबाद जिले के लालबाग कोर्ट रोड के पास स्थित हैं। यहाँ सती का मस्तक मुकुट गिरा था। यहाँ देवी ‘विमला शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘संवर्त’ के रूप में अवस्थित हैं।

(23) विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी, उत्तर प्रदेश, भारत।
विशालाक्षी शक्तिपीठ हिन्दू धर्म के प्रसिद्द 51 शक्तिपीठों में एक है। यहां देवी सती के मणिकर्णिका गिरने पर इस शक्तिपीठ की स्थापना हुई। यह भारतवर्ष के उत्तरप्रदेश राज्य के वाराणसी जिले में में काशी विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर पतित पावनी गंगा के तट पर स्थित मीरघाट( मणिकर्णिका घाट) पर है। देवी पुराण में काशी के विशालाक्षी मंदिर का उल्लेख मिलता है। यहाँ पर देवी ‘विशालाक्षी’ के रूप में तथा भैरव ‘काल भैरव’ के रूप में अवस्थित हैं, जिन्हे काशी (वाराणसी का पुराना नाम) का कोतवाल भी कहा जाता है !

(24) श्रावणी शक्तिपीठ, कुमारी कुंदा, चटगांव, बांग्लादेश।
श्रावणी शक्तिपीठ, बांग्लादेश के चटगांव जिले के कुमारी कुंदा गाँव में हैं। यहाँ सती की रीढ़ की हड्डी गिरी थी, यहाँ देवी ‘श्रावणी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘निमिष’ के रूप में अवस्थित हैं।

(25) सावित्री या भद्रकाली शक्तिपीठ, थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा, भारत।
सावित्री या भद्रकाली शक्तिपीठ, द्वैपायन सरोवर के पास थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा, भारत में स्थित हैं। यहाँ सती की टखने की हड्डी गिरी थी। यहाँ देवी ‘सावित्री या भद्र काली शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘स्थाणु’ के रूप में अवस्थित हैं।

(26) गायत्री शक्तिपीठ, पुष्कर, राजस्थान, भारत।
गायत्री शक्तिपीठ, भारत में राजस्थान राज्य स्थित अजमेर के पुष्कर पर्वत श्रृंखला पर स्थित है। यहाँ सती के दो कंगन गिरे थे। यहाँ देवी ‘गायत्री शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘सर्वानंद’ के रूप में अवस्थित हैं।

(27) महालक्ष्मी शक्तिपीठ, जौनपुर, सिलेट, बांग्लादेश।
महालक्ष्मी शक्तिपीठ, बांग्लादेश के सिलेट शहर से 3 कि. मी. उत्तर-पूर्व, जौनपुर गांव के श्री-शैल पर स्थित है। यहाँ सती की गर्दन गिरी थी। यहाँ देवी ‘महा-लक्ष्मी (धन की देवी)’ के रूप में तथा भैरव ‘शम्बरानन्द’ के रूप में अवस्थित हैं।

(28) देवगर्भ या कनकलेश्वरी शक्तिपीठ, कनकली तला, बोलपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।
देवगर्भ या कनकलेश्वरी शक्तिपीठ भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले में, बोलपुर (शांतिनिकेतन) के उत्तर पूर्व में कोपाई नदी के तट पर स्थित है। यहाँ सती की अस्थियां गिरी थीं। यहां देवी ‘कनकलेश्वरी’ के रूप में तथा भैरव ‘रुरु’ के रूप में अवस्थित हैं।

(29) काली शक्तिपीठ, अमरकंटक, शहडोल, मध्य प्रदेश, भारत।
काली शक्तिपीठ,भारत के मध्य प्रदेश राज्य के शहडोल जिले के अमरकंटक नामक स्थान पर सोन नदी के तट पर एक गुफा में स्थित है। यहाँ सती के वाम भाग का कूल्हा गिरा था।यहाँ देवी ‘काली शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘असितांग’ के रूप में अवस्थित हैं।

(30) नर्मदा शक्तिपीठ, सोनदेश, अमरकंटक, मध्य प्रदेश, भारत।
नर्मदा शक्तिपीठ, भारत के मध्य प्रदेश राज्य के शहडोल जिले में सोनदेश, अमरकंटक नमक स्थान पर नर्मदा नदी के उद्गम स्थान पर स्थित है। यहाँ देवी का दाहिना कुल्हा गिरा था। यहाँ देवी ‘नर्मदा शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘भद्रसेन’ के रूप में अवस्थित हैं।

(31) शिवानी शक्तिपीठ, सीतापुर, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत।
शिवानी शक्तिपीठ भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के चित्रकूट जिले के सीतापुर गांव के रामगिरी पर्वत श्रंखला में स्थित है। यहाँ सती का दाहिना स्तन गिरा था। यहाँ देवी ‘शिवानी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘चांद’ के रूप में अवस्थित हैं।

(32) उमा शक्तिपीठ, वृन्दावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश, भारत।
उमा शक्तिपीठ भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले में, वृंदावन, भूतेश्वर मंदिर के पास स्थित है। यहाँ सती के बालों की चूड़ामणि गिरी थीं। यहाँ देवी ‘उमा शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘भूतेश’ के रूप में अवस्थित हैं। इसके अलावा ये स्थान भगवान कृष्ण के जन्म भूमि होने के कारण भी प्रसिद्ध हैं।

(33) नारायणी शक्तिपीठ, कन्याकुमारी, तमिलनाडु, भारत।
नारायणी शक्तिपीठ भारत के तमिलनाडु राज्य में कन्याकुमारी के पास शुचितीर्थम में विद्यमान हैं। यहाँ सती के ऊपरी जबड़े के दांत गिरे थे। यहाँ देवी ‘नारायणी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘संहार’ के रूप में अवस्थित हैं।

(34) वाराही शक्तिपीठ, पंचसागर।
वाराही शक्तिपीठ : यह शक्ति पीठ पंचसागर में अवस्थित है, जिसका मुख्य स्थान अब तक अज्ञात है ! यहाँ सती का निचला दाड़ गिरा था, यहाँ पर देवी ‘वाराही’ के रूप में तथा भैरव ‘महारुद्र’ के रूप में अवस्थित हैं !

(35) अपर्णा शक्तिपीठ, शेरपुर, बागुरा, बांग्लादेश।
अपर्णा शक्तिपीठ, बांग्लादेश के बागरा जिले के भवानी पुर गाँव में स्थित हैं। यहाँ सती के बायें पैर की पायल या नूपुर गिरी थीं! यहाँ देवी ‘अपर्णा शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘वामन’ के रूप में अवस्थित हैं।

(36) बाला-त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ, त्रिपुरान्तकम्, श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश, भारत।
सुंदरी या बाला-त्रिपुरसुंदरी शक्तिपीठ भारतवर्ष के आंध्र प्रदेश राज्य में श्रीशैलम के पास त्रिपुरान्तकम् में स्थित है। यहाँ सती के दाहिने पैर की पायल या नूपुर गिरी थी। यहां देवी ‘सुंदरी या बाला-त्रिपुरसुंदरी शक्ति’ के रुप में तथा भैरव ‘सुन्दरनन्द’ के रूप में अधिष्ठित हैं।

(37) कपालिनी शक्तिपीठ, तामलुक, मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल, भारत।
कपालिनी शक्तिपीठ, भारत में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में स्थित है। यहाँ सती का बयां टखना गिरा था। यहां देवी ‘कपालिनी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘सर्वानंद’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

(38) चंद्रभागा शक्तिपीठ, जूनागढ़, गुजरात, भारत।
चंद्रभागा शक्तिपीठ, भारत के गुजरात राज्य के जूनागढ़ जिले के प्रभास क्षेत्र में स्थित है। यहाँ सती का पेट या आमाशय गिरा था। यहाँ भगवान शिव का सोमनाथ नामक ज्योतिर्लिंग भी विद्यमान हैं। यहाँ देवी ‘चंद्रभागा शक्ति’ के रूप में और भैरव ‘वक्रतुंड’ के रूप में अवस्थित हैं।

(39) अवंती शक्तिपीठ, उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत।
अवंती शक्तिपीठ, भारत के मध्य प्रदेश राज्य के उज्जैन जिले में स्थित है। यहाँ सती के ऊपरी होंठ गिरे थे। यहाँ महाकालेश्वर नाम से भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग भी हैं। यहाँ देवी ‘अवंती शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘लम्बकर्ण’ के रूप में अवस्थित हैं।

(40) भ्रामरी शक्तिपीठ, नासिक, महाराष्ट्र, भारत।
भ्रामरी शक्तिपीठ, भारत के महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले के गोदावरी नदी-घाटी में जनस्थान में स्थित है। यहाँ सती की ठोड़ी के दोनों हिस्से गिरे थे। यहाँ देवी ‘भ्रामरी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘वक्रकाटाक्ष’ के रूप में अवस्थित हैं।

(41) विश्वेश्वरी शक्तिपीठ, राजमुंदरी, आंध्र प्रदेश, भारत।
विश्वेश्वरि द्राक्षरमं शक्तिपीठ, भारत के आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी जिले के पास स्थित है। यहाँ सती का गाल कटकर गिरा था। यहाँ देवी ‘विश्वेश्वरि शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘वत्साम्भा’ के रूप में अवस्थित हैं।

(42) अम्बिका शक्तिपीठ, भरतपुर, राजस्थान, भारत।
अंबिका शक्तिपीठ, भारत के राजस्थान राज्य के भरतपुर जिले के बिरात नामक स्थान में स्थित है। यहाँ सती के बाएँ पैर की उंगलियां गिरी थी। यहाँ देवी ‘अंबिका शक्ति’के ‘अमृतेश्वर’ के रूप में अधिष्ठित हैं।

(43) कुमारी शक्तिपीठ, कृष्णनगर, हुगली, पश्चिम बंगाल, भारत।
कुमारी शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल, भारत के हुगली जिले में खनकुल ग्राम के रत्नाकर नदी तट पर, कृष्णनगर नामक स्थान पर स्थित है। यहाँ सती के दाहिने कंधे गिरे थे। यहाँ देवी ‘कुमारी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘शिव’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

(44) उमा शक्तिपीठ, मिथिला, बिहार, भारत।
उमा शक्तिपीठ, भारतवर्ष के बिहार राज्य के मिथिला (इंडो नेपाल सीमा के पास), में जनकपुर रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। यहाँ सती का बायाँ कन्धा गिरा था। यहाँ देवी ‘उमा या नील-सरस्वती शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘महोदर’ के रूप में अवस्थित हैं।

(45) नल्हाटेश्वरी या कालिका शक्तिपीठ, नलहाटी, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।
नल्हाटेश्वरी या कालिका शक्तिपीठ, भारत में पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले के नलहाटी में स्थित हैं। यहाँ सती के गले की नाली गिरी थी। यहाँ देवी ‘नल्हाटेश्वरी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘योगेश’ के रूप में अवस्थित हैं।

(46) चामुंडेश्वरी या दुर्गा शक्तिपीठ, मैसूर, कर्नाटक, भारत।
चामुंडेश्वरी या दुर्गा शक्तिपीठ, भारतवर्ष के कर्नाटक राज्य के मैसूर में चामुंडी पर्वत पर स्थित हैं। यहाँ सती के दोनों कान गिरे थे। यहाँ देवी ‘दुर्गा शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘अभिरु’ के रूप में अवस्थित हैं।

(47) महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, वक्रेश्वर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।
महिषमर्दिनी शक्तिपीठ, भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिले में वक्रेश्वर में पम्प्हारा नदी के तट पर अवस्थित हैं। यहाँ सती कि भौंहें गिरी थी। यहाँ देवी ‘महिषमर्दिनी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘वक्रनाथ’ के रूप में अवस्थित हैं।

(48) योगेश्वरी शक्तिपीठ, खुलना, बांग्लादेश।
योगेश्वरी शक्तिपीठ, शक्ति काली को समर्पित हैं तथा ईस्वरीपुर गांव, जेसोर, खुलना जिला, बांग्लादेश में स्थित हैं तथा यशोरेश्वरी मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। यहाँ सती के हाथ तथा पैर के तलवे गिरे थे। महाराजा प्रतापादित्य ने इस शक्ति पीठ की खोज की थी तथा वे इस स्थान में काली पूजा करते थे। यहाँ देवी ‘योगेश्वरी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘चंदा’ के रूप में अवस्थित हैं।

(49) फुल्लौरा शक्तिपीठ, लाभपुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।
फुल्लौरा शक्तिपीठ, भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिला में लाभपुर नमक गांव में स्थित हैं। यहाँ सती के निचले होंठ गिरे थे। यहाँ देवी ‘फुल्लौरा शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘विश्वेश’ के रूप में अवस्थित हैं। यह मंदिर चारो तरफ से इमली के पेड़ो से घिरा हुआ हैं।

(50) नंदिनी शक्तिपीठ, नन्दीपुर ग्राम, साईथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत।
नंदिनी या नदीकेश्वरी शक्तिपीठ, भारतवर्ष के पश्चिम बंगाल राज्य के बीरभूम जिला के नन्दीपुर ग्राम में साईथिया रेलवे स्टेशन के पास अवस्थित हैं। यहाँ सती के गर्दन अस्थियां गिरी थी। यहाँ देवी ‘नंदिनी या नन्दिकेश्वरी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘नंदिकेश्वर’ के रूप में अवस्थित हैं। देवी विग्रह यहाँ सिंदूर से लिप्त हैं जो बड़ी चट्टान के आकार लिये, कछुवे के पीठ के समान हैं, यह देवी वही शक्ति हैं जिनकी आराधना नंदी ने की थीं।

(51) इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, जाफना, श्रीलंका।
इन्द्राक्षी शक्तिपीठ, नैनातिवु (मणिपल्लवम्), श्रीलंका के जाफना के नल्लूर में स्थित हैं। देवराज इंद्र ने यहाँ पर आदि शक्ति काली की पूजा की थी। दानव-राज रावण (श्रीलंका के शासक या राजा) और भगवान राम ने भी यहाँ देवी शक्ति की पूजा की थी। यहाँ सती की पायल(आभूषण) गिरी थी तथा यहाँ देवी ‘इन्द्राक्षी शक्ति’ के रूप में तथा भैरव ‘राक्षसेश्वर’ के रूप में अवस्थित हैं।

हम उम्मीद करते है, आपको हमारा ये संकलन बहुत पसंद आया होगा, इसके लेखक Mr. Vikas Kumar Tiwari माता के साधक एवं ज्ञानवाटिका के प्रमुख संपादक हैं! आप अपने प्रश्न अथवा सुझाव उन्हें कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं!

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