नवरात्र में माँ दुर्गा की पूजा कैसे करें? जानिए नवरात्री पूजन, कलश स्थापना एवं दुर्गा सप्तशती पाठ की सरल एवं सम्पूर्ण विधि !

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Navratri Puja and Kalash Sthapana Vidhi in Hindi

नवरात्री अर्थात नौ विशेष रातें (इस समय शक्ति के 9 रूपों की उपासना का श्रेष्ठ काल माना जाता है)! ये हिन्दू धर्म में मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्यौहार है, जिसमे शक्ति की देवी माँ दुर्गा (जिन्हे हम आदिशक्ति माता के नाम से भी जानते हैं) के तीनो स्वरुप महालक्ष्मी, महासरस्वती तथा महादुर्गा के नव रूपों की पूजा की जाती है ! एक वर्ष में कुल चार नवरात्र होते हैं, दो गुप्त नवरात्र (जो पौष तथा आसाढ़ मास में आते हैं) एवं दो मुख्य नवरात्र (जो चैत्र तथा आश्विन मास में आते हैं) ! इन चारों नवरात्री की शुरुआत शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि से होती है तथा नवमी तिथि को इसका समापन हो जाता है ! इनमे दोनों मुख्य नवरात्र (वसंत तथा शारदीय नवरात्र) प्रमुख हैं !

(1) वसंत नवरात्र : वसंत नवरात्र की शुरुआत हिन्दू नववर्ष के साथ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में पहली तिथि के दिन होती है तथा इसका समापन रामनवमी के दिन होता है!

(2) शारदीय नवरात्र : शारदीय नवरात्र की शुरुआत अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पहली तिथि के दिन होती है तथा इसके समापन के अगले दिन हम दशहरा मनाते हैं!

वस्तुत: श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अंतर्गत देवासुर संग्राम का विवरण माँ दुर्गा की उत्पत्ति के रूप में उल्लेखित है। समस्त देवताओं की शक्ति का समुच्चय जो आसुरी शक्तियों से देवत्व को बचाने के लिए एकत्रित हुआ था, उसकी आदिकाल से आराधना माँ दुर्गा-उपासना के रूप में चली आ रही है। शास्त्रों के अनुसार आदिशक्ति माता ने सृष्टि तथा देवताओं को राक्षसों के आतंक से बचाने के लिए दुर्गा का अवतार लिया था, जिनके नौ विभिन्न स्वरूपों की पूजा नवरात्री में क्रमशः निम्नलिखित रूप में की जाती है !

(1) पहले दिन : माँ शैलपुत्री
(2) दूसरे दिन : माँ ब्रह्मचारिणी
(3) तीसरे दिन : माँ चंद्रघंटा
(4) चौथे दिन : माँ कूष्माण्डा
(5) पांचवे दिन : माँ स्कंदमाता
(6) छठे दिन : माँ कात्यायनी
(7) सातवें दिन : माँ कालरात्रि
(8) आठवें दिन : माँ महागौरी
(9) नवें दिन : माँ सिद्धिदात्री

नवरात्री पूजा की शुरुआत कैसे करें ?

नवरात्र के पहले दिन पूजा की शुरुआत कलश स्थापना के साथ होती है, कुछ लोग कलश स्थापना के साथ अखंड दीप की भी स्थापना करते हैं, यदि आप भी अखंड दीप की स्थापना करना चाहें तो कर सकते हैं लेकिन इसमें विशेष ध्यान देने की जरुरत होती है, क्योंकि अखंड दीप नवरात्र की समाप्ति तक बुझना नहीं चाहिए!

कलश स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण वस्तुएं (Important Things for Kalash Sthapna)

· मिट्टी का पात्र और जौ
· शुद्ध साफ की हुई मिट्टी
· शुद्ध जल से भरा हुआ सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का कलश
· मोली (लाल सूत्र)
· साबुत सुपारी और पंच रत्न
· कलश में रखने के लिए सिक्के
· कलश को ढकने के लिए मिट्टी का ढक्कन
· साबुत चावल
· एक पानी वाला नारियल
· लाल कपड़ा या चुनरी
· फूल से बनी हुई माला
· पंचपल्लव (बरगद, गूलर, पीपल, आम, पाकर) और अशोक या आम के पल्लव
· चंदन, दूब और फूल से बनी हुई माला
· सर्वोषधि (मुरा, जटामांसी, वच, कुष्ठ, हल्दी, दारु हल्दी, सठी, चम्पक, मुक्ता आदि)
· सप्तमृत्तिका (घुड़साल, हाथी खाना, बांबी, संगम नदियों की मिट्टी, तालाब, गौशाला और राजमहल के द्वार की मिट्टी)

सर्वप्रथम पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र करें, तत्पश्चात नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण कर पूजन सामग्री और अपने शरीर पर जल छिड़कें !

ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोअपी वा
य: स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाहान्तर: शुचि: !!

आचमन !
ॐ केशवाय नमः।
ॐ नारायणाय नमः।
ॐ माधवाय नमः।
(साधक एक-एक कुल तीन आचनम करे)

ॐ हृषीकेशाय नमः।
(दाँये हाथ के अँगुष्ठ मूल से होठ पोंछे)

ॐ गोविन्दाय नमः।
(अपनी बाँई ओर हाथ धो ले)

आसन शुद्धि
(आसन पर जल छोड़कर उसे छूते हुए निम्न मंत्र पढ़े)
ॐ पृथ्वी! त्वया धृता लोका देवि! त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि! पवित्रं कुरु चासनम्॥

पवित्री धारण
(अंगूठी या कुश की पवित्र पहने, अंगूठी पहले से हो तो स्पर्श करे)
ॐ पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः।
तस्त ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयमः॥

शिखा बन्धन
(निम्नलिखित या गायत्री मंत्र बोलते हुए शिखा बांध ले, शिखा बंधि हुई हो तो स्पर्श करे)
चिद्रूपिणि महामाये! दिव्यतेजःसमन्विते।
तिष्ठ देवि! शिखामध्ये तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥

उसके बाद माता की चौकी को लाल कपडे से लपेटकर उसपे चारो तरफ मौली लपेट दें, तत्पश्चात चौकी को एक जगह स्थापित कर उसपे माता की तस्वीर या मूर्ति रखें ! फिर कलश रखने के स्थान पर रोली, कुंकुम से अष्टदल कमल की आकृति बनाकर भूमि को स्पर्श करते हुए निम्न मंत्र का उच्चारण करें :

ॐ भूरसि भूमिरसि अदितिरसि
विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धार्त्री !
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ(गुँ)ह
पृथ्वीं मा हि(गुँ)सीः !!

इसके बाद सप्तधान्य या गेहूँ, अक्षत उस स्थान पर अर्पित करने के बाद कलश स्थापना वाले स्थान पर कलश स्थापित करने से पहले साफ़ मिटटी में 3 परत जौ को रखकर उसके ऊपर हल्की मिटी डाल दें, यदि आप अलग किसी पात्र में जौ बो रहे हैं तो जौ को इसी तरह उस पात्र में बो दें तत्पश्चात कलश को स्थापित करें। स्थापना के समय निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है :

ॐ आ जिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्वन्दनवः !
पुनरुर्जा नि वर्तस्व सा नः सहस्रं
धुक्ष्वोरुधारा पयस वती पुनर्मा विशताद्रयिः !!

इसके बाद कलश में जल भरकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें :

ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य
स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य
ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदन्मसि
वरुणस्य ऋतसदनमा सीद !

इसके साथ कलश में चंदन, सर्वोषधि, दूब, पंचपल्लव, और सप्तमृत्तिका, सुपारी और पंच रत्न आदि डाल दें। इसके बाद कलश पर चावल का पात्र रखकर एक नारियल पर स्वस्तिक बनाकर उसके उपर लाल वस्त्र लपेटकर मौली बॉधने के बाद कलश पर स्थापित कर दें। जल का छींटा देकर, कुंकम, अक्षत, पुष्प आदि से नारियल की पूजा करे। वरूण देव को स्मरण कर प्रणाम करे। अब वरुण देवता का स्मरण करते हुए आह्वान करें :

ॐ भूर्भुवः स्वः भो वरुण इहागच्छ,
इहतिष्ठ, स्थापयामि पूजयामि!

तत्पश्चात अक्षत और पुष्प हाथ में लेकर उच्चारण करें :

ॐ अपांपतये वरुणाय नमः!
इसके बाद अक्षत और पुष्प देवता को अर्पित कर दें।

अब कलश के जल में देवी-देवताओं के आह्वान के लिए निम्न मंत्र का उच्चारण करें :

कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्रः समाश्रितः ।
मूले त्वस्य स्थतो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः ॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे, सप्तद्वीपा वसुंधराः ।
अर्जुनी गोमती चैव चंद्रभागा सरस्वती ॥
कावेरी कृष्णवेणी च गंगा चैव महानदी ।ताप्ती गोदावरी चैव माहेन्द्री नर्मदा तथा ॥
नदाश्च विविधा जाता नद्यः सर्वास्तथापराः ।
पृथिव्यां यान तीर्थानि कलशस्तानि तानि वैः ॥
सर्वे समुद्राः सरितस्तीथर्यानि जलदा नदाः ।
आयान्तु मम कामस्य दुरितक्षयकारकाः ॥
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः ॥
अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः ।
अत्र गायत्री सावित्री शांति पुष्टिकरी तथा ॥
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः ।
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ॥
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन्‌ सन्निधिं कुरु ।
नमो नमस्ते स्फटिक प्रभाय सुश्वेतहाराय सुमंगलाय ।
सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधनाथाय नमो नमस्ते ॥
ॐ अपां पतये वरुणाय नमः ।
ॐ वरुणाद्यावाहित देवताभ्यो नमः।

अब कलश स्थापना के पश्चात माता की चौकी के दाएं तरफ घी का दिया जलाएं तथा कलश के बाएं तरफ तील के तेल के अखंड दीप की स्थापना करें,यदि आप अखंड दीप नहीं स्थापित करना चाहते हैं तो सिर्फ माता की चौकी के दाएं तरफ घी का दिया जलाएं और यदि अखंड दीप भी घी का स्थापित करना है तो बाएं तरफ ना कर के दायें तरफ ही करें ! इसके बाद पंचोपचार विधि से गणेश जी तथा नवग्रह की स्थापना एवं पूजा करें !

गणपति पूजन : लकड़ी के पट्टे या चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर एक थाली रखें। इस थाली में कुंकुम से
स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर उस पर पुष्प आसन लगाकर गण अपति की प्रतिमा या फोटो(तस्वीर) स्थापित कर दें
या सुपारी पर लाल मौली बांधकर गणेश के रूप में स्थापित करना चाहिए। अब अक्षत, लाल पुष्प(गुलाब), दूर्वा(दुवी)
एवं नेवैध गणेश जी पर चढ़ाना चाहिए। जल छोड़ने के पश्चात निम्न मंत्र का 21 बार जप करना चाहिए:

“ॐ गं गणपतये नम:”
मंत्रोच्चारण के पश्चात अपनी मनोकामना पूर्ती हेतु निम्न मंत्र से प्रार्थना करें :

विध्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय।
लम्बोदराय सकलाय जगद्विताय॥
नागाननाय श्रुति यज्ञ विभूषिताय।
गौरी सुताय गण नाथ नमो नमस्ते॥
भक्तार्त्तिनाशन पराय गणेश्वराय।
सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय॥
विद्याधराय विकटाय च वामनाय।
भक्त प्रसन्न वरदाय नमो नमस्ते॥

संकल्प : दाहिने हाथ मे जल, कुंकुम, पुष्प, चावल साथ मे ले
“ॐ विष्णु र्विष्णु: श्रीमद्भगवतो विष्णोराज्ञाया प्रवर्तमानस्य, अद्य, श्रीबह्मणो द्वितीय प्ररार्द्धे श्वेत वाराहकल्पे
जम्बूदीपे भरत खण्डे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते, मासानां मासोत्तमेमासे (अमुक) मासे (अमुक) पक्षे (अमुक) तिथौ
(अमुक) वासरे (अपने गोत्र का उच्चारण करें) गोत्रोत्पन्न: (अपने नाम का उच्चारण करें) नामा: अहं
(सपरिवार/सपत्नीक) सत्प्रवृतिसंवर्धानाय, लोककल्याणाय, आत्मकल्याण्य, ………..(अपनी कामना का उच्चारण
करें) कामना सिद्दयर्थे दुर्गा पूजन विद्यानाम तथा साधनाम करिष्ये।“

तत्पश्चात पंचोपचार विधि से माँ दुर्गा की पूजा करें एवं माँ दुर्गा को पूजन सामग्री अर्पित करें !

स्नानार्थ जलं समर्पयामि (जल से स्नान कराए)
स्नानान्ते पुनराचमनीयं जल समर्पयामि (जल चढ़ाए)
दुग्ध स्नानं समर्पयामि (दुध से स्नान कराए)
दधि स्नानं समर्पयामि (दही से स्नान कराए)
घृतस्नानं समर्पयामि (घी से स्नान कराए)
मधुस्नानं समर्पयामि (शहद से स्नान कराए)
शर्करा स्नानं समर्पयामि (शक्कर से स्नान कराए)
पंचामृत स्नानं समर्पयामि (पंचामृत से स्नान कराए)
गन्धोदक स्नानं समर्पयामि (चन्दन एवं इत्र से सुवासित जल से स्नान करावे)
शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि (जल से पुन: स्नान कराए)
यज्ञोपवीतं समर्पयामि (यज्ञोपवीत चढ़ाए)
चन्दनं समर्पयामि (चंदन चढ़ाए)
कुकंम समर्पयामि (कुकंम चढ़ाए)
सिन्दूरं समर्पयामि (सिन्दुर चढ़ाए, ध्यान रहे माँ दुर्गा को मांग में/माथे पर सिंदूर अर्पित नहीं करते हैं क्योंकि माँ दुर्गा की शादी नहीं हुयी थी )
पुष्पमाला समर्पयामि (पुष्पमाला चढ़ाए)
धूपमाघ्रापयामि (धूप दिखाए)
दीपं दर्शयामि (दीपक दिखाए व हाथ धो लें)
नैवेध निवेद्यामि (नेवैध चढ़ाए(निवेदित) करे)
ऋतु फलानि समर्पयामि (फल जो इस ऋतु में उपलब्ध हो चढ़ाए)
ताम्बूलं समर्पयामि (लौंग, इलायची एवं सुपारी युक्त पान चढ़ाए)
दक्षिणा समर्पयामि (दक्षिणा चढ़ाए)

इसके बाद काष्ठ के पवित्र आसन पर दुर्गा सप्तशती की पुस्तक स्थापित करें तथा पुस्तक पूजन करें !

पुस्तक के पूजन का मंत्रः
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:।
नम: प्रकृत्यै भद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥

श्री दुर्गा सप्तशती पाठ के लिए ग्रंथ पूजन के बाद श्री देवी कवच, श्री अर्गला स्तोत्रम्, श्री कीलक स्तोत्र का पाठ जरूर कर लेना चाहिए. उसके बाद माता का सिद्ध मंत्र नवार्ण मंत्र “ऊं ऐं ह्री क्लीं चामुण्डायै विच्चै” की एक माला जप लेनी चाहिए. इसके बाद देवार्थशिर्षम, रात्रिसूक्त एवं देवीसूक्त का पाठ करने का भी विधान है. रात्रिसूक्त के पाठ के बाद तेरह अध्यायों का पाठ एवं पाठ के उपरांत देवी सूक्त का पाठ किया जाता है, किंतु यह सारी प्रक्रिया साधकों के लिए है.

जो लोग रोज सम्पूर्ण सप्तशती का पाठ ना कर पाएं वो एक दिन प्रथम चरित्र, दूसरे दिन मध्यम चरित्र तथा तीसरे दिन उत्तम चरित्र पढ़ कर नौ दिनों में तीन बार दुर्गा सप्तशती को पढ़ सकते हैं अथवा वकार विधि से 7 दिन में सभी पाठ को पढ़ सकते हैं, उसके बाद शेष दो दिनों में प्रथम चरित्र, मध्यम चरित्र एक दिन तथा उत्तम चरित्र को दूसरे दिन करके दूसरी बार पाठ सम्पूर्ण कर लें!

वाकार विधि:
प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है।

नित्य पाठ करने के बाद क्षमा याचना एवं माँ दुर्गा की आरती करें, तत्पश्चात माता को प्रणाम कर आसान से उठे प्रसाद खाएं और घर में सभी को दें उसके बाद जल तथा फलाहार ग्रहण करें !

माँ हम सबकी सभी मनोकामना को पूर्ण करे इसी के साथ
जय माता दी !

उम्मीद करते है, आपको हमारा ये लेख बहुत पसंद आया होगा, इस लेख के लेखक Mr. Vikas Kumar Tiwari माता के साधक भक्त एवं ज्ञानवाटिका के प्रमुख संपादक हैं ! आप अपने प्रश्न अथवा सुझाव उन्हें कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं !

 

 

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नमस्कार...!! इस खूबसूरत संकलन को आपलोगों के समक्ष ज्ञानवाटिका संपादन टीम के द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसके प्रधान सम्पादक और एडमिन विकास कुमार तिवारी जी हैं. इस खूबसूरत संग्रह को बनाने और आपके समक्ष लाने में कई दिन और कई रातों का सतत प्रयास शामिल है, और हम आगे भी इसी निष्ठा से आपके समक्ष महत्वपूर्ण तथा अनमोल जानकारियों को संकलित कर प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध हैं...! इसके साथ ही हम इस बात के लिए भी आशान्वीत हैं की आप सभी अपना महत्वपूर्ण सुझाव देकर, इस खूबसूरत संकलन को और खूबसूरत बनाने में हमारी मदद अवश्य करेंगे !

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